हे रत्नाकर !!
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
तेरे तट पर बैठा,
नमन तुझे मैं करता हूँ ,
देख रहा हूँ तेरा अद्भुत वृहत स्वरूप,
तेरा सुंदर स्थिर धर्म !!
असंख्य रत्न मणियाँ,
हीरे जवाहरात,
गहरे हृदय में छिपाये रखते हो,
पर मृत शरीर को बाहर फेंकते
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
सारी नदियाँ तुझसे मिलती हैं
तुझसे मिलकर गर्वित होती हैं,
त्याग देती अपना नाम गोत्र
स्व अस्तित्व तक भूल जाती है,
हर नदी का इक सपना है
अपने सिंधु से जा वो मिले,
पर्वतों से भले देह कितना छिले
पर नही करती वे शिकवे गिले
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
अंतरिक्ष का जल तुझमें आता है
पूर्णता कभी नहीं होती,
हे सागर ! तू अनंत है, तू अथाह है,
शक्तिशाली है, सामर्थ्यवान है,
भगवान राम को भी त्रेता युग में
तीन दिनों तक तट पर बैठाया,
मर्यादा छोड़ तू कैसे आता,
प्रभु को भी भाया तेरा स्थिर धर्म
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
सुर,असुरों ने संयुक्त रूप से
मिलकर तेरा मंथन कर डाला,
हलाहल विष तेरे भीतर से निकला
तो अमृत भी तूने सुर को दे डाला,
साक्षात माँ लक्ष्मी
तेरे गर्भ से ही प्रकट हुई,
तेरे भीतर का अकूट विष
भगवान शंकर ने गले में डाला
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
क्षीर सागर है तेरे अंदर
अकूत संपदा तेरे अंदर
जीव जीव शरण में तेरे
असंख्य जीवन पलते तेरे अंदर जो
सृष्टि सृजन तुझसे होता है
सृष्टि संहार भी तुझसे होता है,
तू है ब्रह्म रूप में, तू है विष्णु रूप में,
हे रत्नाकर ! तू ही तो है रुद्र रूप में !
अदभुत है तेरा स्थिर धर्म ।
“ सब तीर्थ बार बार गंगा सागर एक बार”