शीर्षक शून्य कविता

जब मन मस्तिष्क में कोई विचार न आये

तो क्या करें , क्या कुछ न लिखे

ऐसा तो नहीं है

कि विचार हड़ताल पर हैं

मन मस्तिष्क शून्य है

चलो आज कुछ ऊट-पटांग लिखते है

बिना किसी शीर्षक के

हो सकता है लोग इसे ही पसंद करे ..

हाँ तो इस समय मैं पार्क में घूम रहा हूँ

बग़ल से कोई जा रही है

कोई चाइनी महिला लग रही

मुझे देखती है मुस्करा देती है

बदले में मैं भी मुस्करा देता हूँ

वह आगे बढ़ जाती है, मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ

सोच रहा हूँ कि क्या भाषा जाने बिना

बातें नहीं हो सकती, बातें तो मेरी हो गई,

मुस्कराहट भी तो बात ही है

मुस्कराहट ही ज़िन्दगी है .

एक अंगेज़ महाशय भी चले आ रहे सामने से

दोनों हाथों में दो कुत्तों की लगाम पकड़े हैं

हमारा आमना सामना होता है

हलो हाय होता है , वे मुस्करा देते हैं

बदले में हम भी मुस्करा देते हैं

यह बात अलग है कि इन महाशय की

अंग्रेज़ी भाषा मेरे दिमाग़ में घुस गयी

तो दोस्तों !! लिखते रहिये

विचारों की चिंता न करिये

वे आयेंगे और यह कहेंगे कि मैं आ गया हूँ

यह चिन्तन की एक सतत प्रक्रिया है

जब तक कोमा में नही है, विचारों की कमी नही है,

जरा उस लेखक के मन की सोचिये

जिसका मन मस्तिष्क काम कर रहा है

लिखना चाहता है, बोलना चाहता है

परन्तु अंग निष्क्रिय पड़े हैं

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