कथा श्रवण परीक्षित जैसी
वाचक हो शुक देव सा
भक्त बनो प्रह्लाद के जैसे
प्रभु दास बनो हनुमान सा।
पाद सेवन माँ लक्ष्मी जैसी
प्रभु वंदन अक्रूर सा
संख्य भाव में अर्जुन बन जाओ
उपदेशक हो श्रीकृष्ण सा ।
अर्पण कर दो तन मन प्रभु को
आत्म निवेदन राजा बलि सा
नवधा भक्ति में रम जाओ
प्रेम भाव हो शबरी जैसा ॥