प्रिय तुम कहते थे तुम मेरे हो एक गीत

प्रिये ! तुम कहते थे तुम मेरे हो

पर साथ छोड़ क्यों चले गये .

हाथों में हाथ जब आप दिये, पकड़कर हम साथ चले

जहां जहां चले आप,,,, वहाँ वहाँ हम संग चले

सुख दुख बाँटे हम साथ साथ, तुम मेरे अवलंब रहे

उठी क्षितिज से वेग भरी आंधी, आँधी में तुम उड़ चले ..

प्रिये ! तुम कहते थे तुम मेरे हो

पर साथ छोड़ क्यों चले गये .

सूना सूना सा घर आँगन, वह सजीवता अब नही रही

बिखर गया परिवार आपका,कहाँ गये किस ओर गये

नहीं कटती दुख की रातें, हृदय व्यथित नेत्रों से नीर बहा

कष्ट कारक है बिछुड़न, पांवर प्राण क्यों न निकल गये ..

प्रिये ! तुम कहते थे तुम मेरे हो

पर साथ छोड़ क्यों चले गये

जो भी कहती सुन लेते, इच्छायें सब मेरी पूरी करते

मैं तो आपकी अर्द्धांगिनी, अर्ध भाग ले निकल चले

देख दशा मेरी करुणा पुकार, वर्षा दृगों में भर लायी

हृदय मिली न शीतलता, हृदय दग्धकर निकल चले

प्रिये ! तुम कहते थे तुम मेरे हो

पर साथ छोड़ क्यों चले गये

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