बेटी का दर्द

तू हँसती थी तो मैं हँसता था, तू रोती तो मैं रोता था

बेटी तू तो नही अब जीवित है, पता नहीं कैसे मैं जीवित हूँ ..

तेरी हर पीड़ा को मैने समझा, दुख को सुख कर डाला

प्रभा पूर्ण तव मुख निहार, जीवन ख़ुशियाँ ले डाला

पर नहीं बचा पाया तुझको, इस दुर्दांत जमाने से

कुछ भेड़ियों ने घात किया, अंग अंग तेरा नोच डाला ..

फूल सी होती है बेटियाँ, अन्जान है छिपे भेड़ियों से

नोच डाला मिल पापियों ने, इज़्ज़त तार तार कर डाला

डाक्टर बनाया था बेटी को, वह समाज की सेवा करेगी

समाज ने कुचल डाला, आँख तक उसकी फोड़ डाला ..

धर्म पथ पर जो चला नही , विधर्मी वह कहलाता है

अन्याय को समझता हक, वह हक कहाँ से पाता है

मैं ठहरा उसका पिता, कैसे जीवित हूँ नहीं पता

या खुदा मेरी क्या ख़ता, कुछ समझ नहीं आता है.

न्याय सत्ता अब कुछ नही,पापी अधर्मी सब हो चले

न्याय की भी आशा नही, खुले नृत्य कर रहे मनचले

जायें तो जाये कहाँ, कौन सुनेगा इस बाप के दर्द को

बेटी के बाप के दर्द को, बेटी के बाप ही कुचल चले ..

हे कृष्ण ! काश अर्जुन मैं होता, आप होते मेरे सारथी

चीर देता इन विधर्मियों को, इनके इस कुकृत्य पर

जीने का हक़ नहीं इनको, पशुत्व जीवन ये जी रहे

भार हैं इस धरा पर, आस केवल प्रभु सुदर्शन चक्र पर ।

तू हँसती थी तो मैं हँसता था, तू रोती तो मैं रोता था

बेटी तू तो नही अब जीवित है, पता नहीं कैसे मै जीवित हूँ ..

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