प्राण बोला तन से

प्राण बोला तन से

मित्र ! आज तो मेरी विदाई है,

बहुत दिया है साथ आपने

अच्छी मित्रता निभाई है ।

क्या चलोगे तुम मेरे साथ

पर कैसे चलोगे,

भारी भरकम यह तन लेकर

मेरे साथ तो नहीं उड़ पाओगे ।

मैं तो वायु हूँ, उड़ लूँगा,

मुझमें इतनी शक्ति है,

पर तुम मेरे बिन कैसे रहोगे

दोस्त ! यहीं तक तुम्हारी हस्ती है ।

कैसे अस्तित्व बचेगा तेरा

तू तो मुझ पर ही निर्भर है,

कैसे रहूँ अब मैं तेरे साथ

तन तेरा हो गया अब जर्जर है ।

बोला तन - हे मेरे कलपुर्ज़ों !

तुम्हीं बताओ कितने क्षण जीवित रहोगे,

प्राण के ऊपर गर्वित होता था

प्राण बिना अब तुम कैसे रहोगे?

हृदय बोला - दस मिनट तक

मैं धड़कूँगा, हाँ मैं धड़कूँगा,

उसके बात नहीं क्षमता मेरी

मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा ।

मस्तिष्क बोला - बीस मिनट

मैं भी सक्रिय रहता हूँ,

यदि प्राण नहीं है साथ मेरे

कैसे मैं चल सकता हूँ ।

आँखें बोली - चार घंटे

हाँ मुझमें दृष्टि रहती है,

सही समय पर मुझे बदल दो

दृष्टि आगे भी चल सकती है ।

नेत्र दान कर सकते हो

आगे भी मैं दृष्टि दूँगी,

चार घंटे कम नहीं तेरे पास

हर कसौटी पर मैं खरी उतरूँगी ।

त्वचा बोला- पांच दिन

यहाँ तक मेरी क्षमता है,

रक्त का संचार मिले जाये

त्वचा शीघ्र चमकता है ।

हड्डियां बोली - तीस दिन

अजमा लो मेरी शक्ति को,

तुमने जो कसरत की है

हे तन ! ये फल है तुझको ।

कर्म सुन रहा था सबकी बातें

अंत में वो सामने आया,

मैं हूँ तेरा जन्म जन्म का साथी

तेरे हर जन्म में साथ निभाया ।

चाहे बदल ले कितने चोले

मैं साथ कभी नहीं छोड़ता,

जैसा कर्म करता तू मानव

जन्म जन्म में वैसा भुगतता ।

मत कर चिंता इस तन की

पंचतत्व यह निर्मित तन है,

फिर मिलेगें संयुक्त घटक

एक नये कलेवर में,ये निश्चित है ।

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