कैसे करूँ परिभाषित कितनी सुन्दर है तू मेरी कविता
भावों की तू है अभिव्यक्ति रस छंदों में गुँथती कविता ॥
सुरताल पर जब थिरकती,, तब खिलती है तू कविता
छंद विधान में जब बँधती है तब निखरती है तू कविता
पतझड़ जब भी आता है क्रंदन करती है मेरी कविता
कैसे करूँ परिभाषित कितनी सुन्दर है तू मेरी कविता ॥
उठती जब टीस हिय में अश्रुधार बन छलकती कविता
रसश्रृंगार में घुलती है तो नूपुरी रुनझुन सुनाती कविता
वीररस में जब ढलती है तब बन जाती रणचंडी कविता
कैसे करूँ परिभाषित कितनी सुन्दर है तू मेरी कविता ॥
जीवन के संघर्षों से लड़ने की शक्ति देती है तू कविता
वीरों के आहुति पर देशप्रेम का पाठ सिखाती कविता
भक्ति रस में डूब जाये तो दिव्य ध्वनि सुनाती कविता
कैसे करूँ परिभाषित कितनी सुन्दर है तू मेरी कविता ॥
कैसे करूँ परिभाषित, कितनी सुन्दर है तू मेरी कविता
भावों की तू है अभिव्यक्ति रस छंदों में गुँथती कविता ॥