मुकाम

मुकाम तू निश्चित पायेगा ,रण छोड़ नही संघर्ष कर

अवरोध पग पग पर मिलेंगे, कंटकों की परवाह न कर

चलता जा तू ऐ वीर सिपाही

अपने निश्चित कर्म पथ पर

हांक तेरी एक ही रहे

आगे बढ़ें आगे बढ़े

प्रेम से लगाना सबको गले

जो तुझे पथ में मिले

रुकना नही तू ऐ राही

जब तक पहुँचे न मुकाम पर

सत्य पथ पर बढ़ चले तू

असत्य को दुत्कार कर ।

मंजिल तू निश्चित पायेगा, मन में न पाल कोई विकार

सफलता तेरी कदम चूमेगी, तेरे आगे नतमस्तक होकर

जयचन्दों की न है कमी

न होगी भारत भूमि पर

झुका देते हैं मस्तक अपना

दुश्मनों की तलवार पर

मृत्यु शाश्वत सत्य है

दृढ़ प्रतिज्ञ उससे डरते नही

करते है दुश्मनों का सामना

सामने से ललकार कर

चीर दे दुश्मन का सीना

सामने से ख़ंजर मार कर ।

भीरू मत बनना कभी, शेर की जैसी दहाड़ कर

बढ़ता जा निर्भीक आगे, फुलाये सीना तान कर ॥

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