झुलसती धरती

प्रकृति का दोहन करने वालों,

जरा सजगतुम हो जाओ।

नहीं पाओगे शरण कहीं,

न कोई तुम्हें बचाएगा।

प्रकृति ही तेरी रक्षक है,

प्रकृति ही तेरी भक्षक भी।

खिलवाड़ न करो उससे अब,

नहीं तो दाह में भस्म हो जाओगे।

हरियाली से तुम हो अनजान,

क्यों नयन तुम्हारे तरसते हैं?

तू साफ़ कर रहा वृक्ष‑समूह,

कहाँ फिर तुझे छाँव मिलते हैं?

वृक्ष काटना नहीं छोड़ रहे,

समझ रहे हो अपना अधिकार।

विकास के नाम पर कब तक

घने जंगलों को करोगे वार?

घर‑घर बोर वेल चाहिए,

पूर्ण‑आधिपत्य तेरा चाहिये।

एक दिन ऐसा आएगाबेटा,

जल‑स्तर तू न ढूँढ पाएगा।

प्रकृति को दोष देते फिर रहे,

अपनी करनी पर होश नहीं।

गर्मी की तपिश जब चिल्लाएगी,

प्राण कहाँ भागकर बचाओगे?

स्थिति ले रही विकट रूप,

और भी होगी यह विस्फोटक।

संसार, चेत जानिकृष्ट मनुष्य,

वरना अस्तित्व न मिलेगा सकुचकर।

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