ऐ मेरी रसना

ऐ मेरी रसना

राम नाम तू क्यों नहीं रटती

निन्दा करती दिन रात औरों की

तेरा जी नहीं भरती

विषयों में अनुरक्ति तेरी

समय व्यर्थ तू करती

भाग रही मृगतृष्णा के पीछे

अमृत रस ग्रहण नहीं करती

श्रवन कलंकित हो गये तेरे

ईर्ष्या द्वेष की बातें सुनती

नहीं करती भगवद् भजन तू

सत्संग से दूर भागती ।

विशुद्ध मुख नही है तेरा

विष वमन तू करती

अभी चेत जा तू मेरी रसना

राम नाम क्यों नहीं रटती ।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.