मेरी सोच

नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहता हूँ

बैठ जाता हूँ झील किनारे प्रकृति को झांकता रहता हूँ.

हरे भरे ये वृक्ष सुहाने मेरे मन को भाते हैं

खिले हुए ये पुष्प सुगंधित मेरे मन को ललचाते हैं

कहाँ से पाया रंग रूप यह सुन्दर इसे सोचता रहता हूँ

नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहता हूँ

पक्षियों के कलरव को देखता, गतिविधियों को पढ़ता हूँ

अन्जानी भाषा की बोली, समझने की कोशिश करता हूँ

समझ नहीं पाता कुछ भी, पर सुनकर आनन्दित होता हूँ

नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहता हूँ

बेज़ुबान प्राणी भी संवेदना रखते, उनके दिल भी कोमल हैं

प्रेम की भाषा वे पहचाने, संकेतों से करते प्रदर्शन हैं

क्रूरता नहीं दया के पात्र हैं वे, प्यार मैं उनसे करता हूँ

नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहता हूँ

नही गँवाता बहुमूल्य समय, व्यर्थ की कोरी बातों में

इधर उधर की बात न करता, न पड़ता किसी पचड़े में

बैठ जाता जा झील किनारे, प्रकृति को झांकता रहता हूँ

नीरवता की गहराई में मग्न अकेले रहता हूँ

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