लव कुश

वाल्मीकि का पावन आश्रम, दो बालक वहाँ पर पलते थे

लव कुश उनके नाम हैं सुन्दर, बहुत मोहक वे दिखते थे।

अश्वमेध का घोड़ा पकड़ा, लाकर एक वृक्ष से बांध दिया

दी खुली चुनौती बालकों ने, अवध सेना से संग्राम किया ।

शत्रुघ्न आये, लक्ष्मण आये, भरत जी आये हनुमंत संग

किया मूर्छित तीखे तीरों से, पड़े धरा पर सब सेना संग ।

हनुमान जी भी बंधन में हैं, प्रभु के अंश को निहार रहे

दो वीर बालकों की प्रतिभा, मन ही मन खूब बखान रहे ।

अंत में राजा राम भी आये, देख कर अचरज वे खाये

सुन्दर सुन्दर बालक दोनों, नयनों को उनके अति भाये ।

समझा रहे वीर बालकों को, अश्व छोड़ घर को जाओ

अबोध बालक दोनों तुम हो, रणभूमि से हट तुम जाओ ।

क्षमादान तुमको देते है, रणभूमि में आने की उम्र नही

छोड़ दो अपना बाल हठ, रण तुम्हारे लिए उचित नही ।

लौट जाओ तुम वीर बालकों ,अभी हो बालक सुकुमार

माता पिता के भविष्य हो तुम, मत बढ़ाओ अनुचित रार ।

नहीं मान रहे बालक दोनों , प्रभु राम को दिया ललकार

वाण तन गये आमने सामने, विश्व में मच गया हाहाकार ।

गुरूवर आ पहुँचे उसी समय,छीनते हैं हाथ से तीर कमान

मँगवायी क्षमा लव कुश से, राजा राम हैं तेरे पिता समान ।

बोले श्रृषि वर महाराज से,बच्चे होते ही हठी और नादान

आप साक्षात अयोध्या नाथ हैं, बालकों को दे अभयदान।

अयोध्या नरेश प्रसन्न हुए, नवाया गुरुवर को अपना माथ

आमंत्रित किया बालकों को,आना अयोध्या गुरु के साथ ।

सुना लव कुश से पूरा वृतांत, मां सीता अति व्यथित हुई

क्रोधित हुई दोनों बच्चों पर, कहां तुम दोनों की मति गई ।

फटकार रही दोनों पुत्रों को, हाय तुमने क्या ये कर डाला

राम चन्द्र हैं पिता तुम्हारे, घोर अपमान उनका कर डाला ।

भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, तीनों ही तो तुम्हारे काका हैं

हनुमान जी हैं सबके रक्षक,तुमने घर में ही डाला डाका है ।

चरण स्पर्श जिनका करना था, आशीष जिससे लेना था

तुमने उनसे ही युद्ध किया, किसने तुम्हें यह सिखाया था ।

धिक्कार है मेरे जीवन को,विधाता ने ऐसा दिन दिखाया है

कैसे प्रायश्चित हो इस त्रुटि का,नहीं समझ में आया है ।

सुनकर सब बातें माँ की, लव कुश बहुत व्यथित हुए

गिर पड़े चरणों में माता के,क्षमा क्षमा हम बालक हुए ।

भूल हुई है हमसे भारी, हम तो अनभिज्ञ थे इन बातों से

अनजाने में चूक हुई हमसे, त्रुटि सुधार करें हम कैसे ।

मिली चुनौती कैसे हटते,गुरू जी ने यही पाठ पढ़ाया है

क्षत्रिय कभी चुनौती से न डरते, गुरु शिक्षा यही पाया है ।

सुनकर प्यारी बातें दोनों की,श्रृषि सीता को समझाते हैं

दोष नही है तुम्हारे बच्चों का, वही होता जो प्रभु करते हैं ।

बोली सीता तब लव कुश से, जाओ बैठ प्रायश्चित करो

इस गलती का अहसास करो,मन में प्रभु का ध्यान धरो ।

लव कुश अति प्रसन्न हुए, माँ का पाया जब आशीर्वाद

पछताते अपनी गलती पर, करना है पर पिता से संवाद ।

क्यों त्यागा माँ को वन में, इक धोबी के झूंठी बातों पर

माँ का कलंक हम मिटायेंगें, अयोध्या राज्य हम जाकर ।

चल पड़े अयोध्या गुरु के संग, राम कथा वहाँ सुनाते हैं

सुनकर पावन कथा बच्चों से,नर नारी द्रवित हो जाते है ।

राजा राम बोले हे गुरुवर,सीते को यहां दरबार बुलाना है

चरित्र पवित्रता का प्रमाण,सबके समक्ष यही दिखाना है ।

माँ सीता पहुँचती है राम दरबार, श्रृषि वर के बुलाने पर

देती चुनौती सबके समक्ष, अपने ऊपर लगे लांक्षन पर ।

माँ सीता बोली हे प्रभु, लव कुश पुत्र हैं आपके दोनों

कर रही हूँ आपके सुपुर्द, श्रृषि वर के पाले हैं ये दोनों ।

श्रृषि वर से शिक्षा पायी है, दोनों हैं सर्व गुण संपन्न

स्वीकार करें अपने पुत्रों को ,रघुकुल के दोनों हैं अंग ।

नाता हमारा यहीं तक था, प्रभु अब मैं प्रस्थान करती हूँ

क्षमा करना प्रभु हमको,अन्तिम विदा आपसे माँगती हूँ।

प्रण करती हूँ सबके समक्ष, हे धरती माँ तुम फट जाओ

प्रश्न चिन्ह है मेरी पवित्रता पर,निष्कलंक मुझे कर जाओ।

तन मन से यदि मैं प्रभु की दासी हूँ ,गोद में मुझे ले लो

दे दो प्रमाण मेरी पवित्रता का, शरण में तुम मुझे ले लो ।

समा गयी माँ सीता धरती में ,धरती से ही तो जन्मी थी

शत शत नमन है माँ तुमको, साक्षात तुम तो लक्ष्मी थी ।

लोग पछताते अपनी बातों पर, माँ को निर्दोष मानते है

रो रहें हैं प्रभु स्वयं आज, हे सीते हम भी पीछे से आते हैं ।

राज धर्म से मैं बंधा हुआ था, तुम तो हमेशा पवित्र ही हो

बहुत ही रहा ये असहाय राम , तुम ही तो मेरी शक्ति हो ।

रोते रहे विलखते रहे श्रीराम, यह सब प्रभु की लीला थी

नर लीला समाप्त अब होना था, जाने की अब तैयारी थी ।

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