आपका हँसता हुआ
सबको हँसाता हुआ,
हरफ़नमौला व्यक्तित्व,
विपरीत परिस्थितियों में भी तटस्थ रहने वाला,
अपनी धुन में ही रमता हुआ
एक सिद्ध योगी जैसा दिव्यमान चेहरा
मेरी स्मृतियों में हुबहू
आज भी सब कुछ याद आता है .
शास्त्र पारंगत, वेद विशारद,
भागवत वाचक, शास्त्रार्थ प्रेमी,
रामचरितमानस के कुशल चितेरे,
अद्भुत गायन, अद्भुत शैली
सब कुछ तो कंठस्थ था आपको
श्रावण का महीना हो
आल्हा ऊदल की ललकार न हो
ढोलक की थाप पर
वीर रस की हुंकार न हो
कायरों के मन को भी झंकृति करती थी
हाँ सब कुछ याद आता है
सोहर हो या मल्हार हो
फाल्गुन की फगुआ का
रंग बिरंगी मस्त बौछार हो
झूम जाते थे हम सभी
आनन्दित कर देते छोटे बड़े सबको
सीख नहीं पाया, कुछ ले नहीं पाया
अबोध था, अन्जान था
प्रणम्य हैं बड़े पिताजी आप मेरे,
आपकी ही प्रेरणा से
कुछ सृजन करता हूँ
आपका महान व्यक्तित्व याद आता है
श्रृद्धापूर्ण श्रृद्धांजलि
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