बेटी की पीड़ा

अरे भेड़ियों ! अधम हो तुम, नज़र बेटियों पर डालते हो

क्या माँ बहन नहीं है तेरे घर,जो राह बैठे तकते रहते हो

बेटियों को समझ रहे खिलौना,मर्जी से अपनी खेल रहे

तार तार करते उनकी इज़्ज़त, स्वयं को मर्द समझते हो ।

मर्द नहीं तुम कायर हो, मर्दों का तो यह होता कृत्य नही

नारी सम्मान पर जो लड़ जाये, वही होता पुरुषत्व सही

शरम नहीं आती है तुमको, अश्लील खेल जो खेल रहे

हाथ नहीं कट जाते तेरे, सिर कट गिर नहीं जाते हैं मही ।

क्या अंतर है तुममें उनमें, यही कि वो इक अबला नारी है

नहीं सोचते रे अधम तुझे पैदा करने वाली भी इक नारी है

एक दूसरे के पूरक दोनों ,सृष्टि संयुक्त मेल से सृजती है

सोच जरा कहीं ऐसा न हो, कोख में ही जान तेरी भारी है ।

अबला को मात्र अबला न समझ, वह दुर्गा लक्ष्मी बाई है

कट गये सिर धड़ से, जब जब रणचंडी बनकर वो आई है

हे बहन बेटियों !जग जाओ दो दो हाथ करो इन राक्षसों से

छोड़ो मेंहदी भुजा सँभालो, अब अस्तित्व पर बन आई है ।

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