माला के मनके कहते हैं
ऐ मन ! तू मुझ पर टिक जा !
बुद्धि गिनती है मनके, कहती नहीं नहीं
एक सौ आठ पर जाकर रुक जा
माला के मनके यही चाहते, उन पर मन टिक जाए
फ़ितरत मन की ऐसी,, एक जगह न टिक पाए
मन कहता क्यों रुकूँ,, चंचल स्वभाव है मेरा
सतत साधना ही शक्ति है जो रोक मुझे पाए ।
माला के मनके कहते है
श्वास सुन रहा मन की बातें, मन ही मन मुस्काया
ध्यान न है तेरी साँसों पर मेरी गणना कौन कर पाया
गिन गिन कर मनके जपता है ध्यान नहीं मुझ पर तेरा
हर क्षण हर पल अमूल्य है बंदे समझ नहीं तू पाया ॥
माला के मनके कहते है
ईश्वर को तू बाँध रहा मनके की गणना में,
कौन बांध सका ईश्वर को, ये समझ नहीं पाया
हर क्षण हर पल भज ले वंदे यही हाथ है तेरे
मनके की गणना न कर श्वास श्वास में प्रभु को पाया ॥
माला के मनके कहते हैं.