लंका कांड हनुमान जी का मुक्का

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग ।

तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥

हनुमान जी ने सत्संग का प्रभाव पूरी लंका पर डाला पर दो पात्रों पर उसका ज्यादा असर हुआ -

1. लंकिनी 2. विभीषण ।

👉लंका में घुसते ही हनुमान जी की मुलाक़ात लंकिनी से हो जाती है मसक समान छोटा रूप धारण करने के बावजूद भी लंकिनी ने हनुमान जी को चुपके से लंका में प्रवेश करते हुए पहचान लिया ।

नाम लंकिनी एक निशचरी, सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥

हनुमान जी ने पूंछा - क्या लंका में सब भूखे ही है सब मेरा भक्षण करना चाहते हैं ? लंकिनी ने कहा - देख रे वानर ! अपने नेत्रों से देख ले ..पूरी लंका स्वर्ण नगरी की है, धन वैभव के सामने इन्द्रपुरी भी नहीं है और तू कहता है कि यहां भोज्य पदार्थ की कमी है ? तू तो चोरी से लंका के अंदर जा रहा है इसलिए तुझे ग्रास बनाना चाहती हूँ , मेरा आहार ही नर वानर है ।

जानेहि नहीं मर्म सठ मोरा , मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

भावार्थ : हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक मोर अहार जहां लगि चोरा” यही मेरा आदर्श है यही मेरा कर्तव्य है ..मैं तुझे खा जाऊँगी,,, हनुमान जी ने सोचा यह बात से मानने वाली नहीं है, उसे एक घूंसा जड़ दिया , हनुमान के एक घूँसे के प्रहार से वह नीचे गिर गयी और उसके मुख से रक्त बहने लगा । शठ लोगों को ज्ञान सिखाने के लिये दंड देना जरूरी होता है, “शठे साट्ठयम न समाचरेत “.देर से सही पर उसको सत्संग की महिमा समझ आ गयी और बोलती है हे हनुमान ! मुझे क्षमा करें !

आपका घूँसा रूपी सत्संग पाकर मैं धन्य हो गयी । हनुमान जी बोले - मुक्का खाना कोई सत्संग है क्या ?

जी हाँ ..मुक्केबाज़ी अर्थात दंड भी एक सत्संग का हिस्सा ही है अगर सही जगह चोट लगे तो हनुमान जी से मुक्का खाकर लंकिनी के ज्ञान चक्षु खुल गये, ब्रह्मा जी की बतायी बातें सब उसे स्मरण हो गयी ..यह बात भी सत्य है कि मुक्के बरसने के बाद भी कभी कभी संसार का राग रूपी रक्त नही बहता, कभी मुँह के बल नहीं गिरते पर एक मुक्के का प्रभाव यहां लंकिनी पर ज़बर्दस्त पड़ा !

प्रश्न उठता है कि हनुमान जी ने लंकिनी को मुक्का क्यों मारा? वह इसलिये कि उन्होंने लंकिनी के भ्रम को दूर किया ! हनुमान जी को लंकिनी चोर क्यों कह रही थी?? वह मानती थी लंका का राजा रावण है पर यह वानर चुपके से लंका में घुसना चाहता है वह चोर है, यही लंकिनी का भ्रम था ! चोरी तो जानकी जी का अपहरण कर रावण ने भी की थी, असली चोर तो रावण है, उसको स्वामी समझ रही है और मुझे चोर बता रही है, हनुमान जी ने दंड स्वरूप एक मुक्का जड़ दिया लंकिनी की समझ में आ गयी और बोली -

प्रविसि नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कोशलपुर राजा ॥

अर्थात् जाओ हनुमानसच्चा स्वामी तो ईश्वर है हृदय में राम का नाम लेकर लंका में प्रवेश करो, सभी कार्य तुम्हारे सिद्ध हों ।

👉याद करिए रावण को भी लंका युद्ध में हनुमान जी ने मुक्का मारा था, रावण अचेत हो गया, होश आने पर वह बोलता है, हे वानर ! तेरे मुक्के में असीम शक्ति है । हनुमान जी ने सिर पीट लिया ! रावण ने कहा मैं तेरी प्रशंसा कर रहा हूँ और तुम अपना सिर पीट रहे हो ? तो हनुमान जी ने कहा- “

धिग धिग मन पौरुष धिग मोही, जौं तै जिअत रहेसि सिर द्रोही ॥

मैं तो अपने पुरुषत्व को धिक्कार रहा हूँ तू मरा क्यों नही मरा ही नही तो मेरी प्रशंसा कैसी ??? प्रशंसा तो तब है जब तू मेरे मुक्के के प्रहार से मर जाता तू दंड का पात्र है , तुझे समझाने से कोई लाभ नहीं है । यहाँ हनुमान जी के मुक्के के प्रभाव रावण पर विपरीत पड़ता है , दुष्ट प्रवृत्ति के लोग कभी नहीं सुधरते हैं ।

👉भ्रान्ति विभीषण के मन में भी थी, पर वह मुक्के के पात्र नही थे प्यार से समझाने के पात्र थे । हनुमान जी द्वारा विभीषण को समझाने का परिणाम ही है कि उनके अंतःकरण में रावण के प्रति वितृष्णा और राम के प्रति भक्ति भाव जागृत हुआ और रावण के लात मारने पर अंत में भगवान राम की शरण में गये ।

👉रामचरितमानस का दर्शन यही है कि परमार्थ और स्वार्थ दोनों एक जगह नहीं रह सकते, मिल सकते हैं पूरक बन सकते हैं ।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है -

“सठ सुधरहिं सत्संगति पाई, पारस परस कुधात सुहाई। विधि बस सुजन कुसंगत परहीं, फनि मन सम निज गुन अनुसरहीं ॥

अर्थात् दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है किन्तु दैव योग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड जाते हैं तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं , दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को ही प्रकाश देते हैं ।

कवि

एक स्वतंत्र लेखक, समीक्षा कार, रचनाकार

नोएडा, उत्तर प्रदेश

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