क्या क़ुसूर था मेरा

क्या क़ुसूर था मेरा, सजन मेरे क्यों छोड़ चले

क्या क़ुसूर था मेरा, सजन मेरे क्यों छोड़ चले

ब्याह कर लाये मुझको, डोली पहुँची पिया के घर,

शोक संदेशा घर में आया, नहीं रहे मेरे प्रिय वर।

निशब्द रही, किंकर्तव्यविमूढ़, सपने चकनाचूर हुए,

हाय विधाता क्या क़ुसूर था, आप मेरे विपरीत हुए।

बीच मँझधार में नाव फँसी, पतवार छोड़ निकल चले,

अंत क्यों ऐसा हुआ, सजन मेरे क्यों छोड़ चले।

कितनी ठहरी मैं अभागिनी, कुलक्षणी मैं कहलायी,

पिया मिलन से पहले, मेरे सजन की अर्थी आयी।

नियति कितनी क्रूर ठहरी, तनिक दया नहीं आयी,

सपने धूल धूसरित हुए, क्षण में भाग्य पलटा खायी।

किन जन्मों का पाप रहा, प्रतिशोध लेकर निकल चले,

आखिर क्या क़ुसूर था मेरा, सजन मेरे क्यों छोड़ चले।

रही अहिंसा की पुजारिन, जान पिपीलिका भी न मारी,

किन अपराध वधिनी हुई, रक्तरंजित हुई सुहाग सारी।

कैसे जिऊँगी, क्या प्रयोजन, मुरझा चले अरमान सारे,

निस्तेज, पाषाण सी, शून्य, जीवन तारनहार के सहारे।

तुम त्याग दिये, मैं त्याज्य रही, पर पत्नी धर्म निभाऊँगी,

तपस्विनी सा जीवन होगा, तप में यह तन मैं जलाऊँगी।

नारी का सृजन सार्थक होता, पति का अनुसरण करने में,

जिऊँगी योगिनी सा जीवन, शेष अब प्रायश्चित्त करने में।

अगम डगर है, अति दुर्गम है, शूल बिछाकर निकल चले,

आखिर क्या क़ुसूर था मेरा, सजन मेरे क्यों छोड़ चले

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.