कर्म पथ

चलता रहूँ कर्म पथ पर, पग पीछे मेरे न हटे

सच्चाई की राह पर, लेखनी मेरी कभी न डिगे ॥

कर्म ही तो धर्म हमारा, गीता ने यही सिखाया है

कृष्ण के उपदेश पर ही, अर्जुन ने गांडीव उठाया है

अधर्म बोलता है जहाँ प्रभु अवतरित आ होते हैं

रच देते हैं महाभारत व्यास आदि कवियों ने गाया है ।

धर्म ध्वजा झुकने न पाये, इसका सदा मान बढ़े

वीरों की शौर्य गाथा पर, लेखनी मेरी न डिगे ॥

राष्टधर्म होता सर्वोपरि, राष्ट का अपमान नहीं करते

जो राष्ट विरुद्ध कृत्य करते, उनका गुणगान नहीं करते

धिक्कार है उनके जीवन को, जिनके हृदय में देशप्रेम नही

नर नही, पशुत्व हैं वो, धरती माँ से प्यार नहीं करते ॥

गति हीन पंगु से पड़े हुए, सुप्त युवा अब जग जायें

शंखनाद करें वीरोचित, संग्राम से न वे डिगे ॥

राष्ट तुम्हें पुकार रहा है, अधर्मियों की है फ़ौज खड़ी

देश के दुश्मनों को सबक़ सिखाने की आ गयी घड़ी

यदि सोते तुम रह जाओगे, राष्टधर्म कैसे निभाओगे

इतिहास यही बतायेगा, कायरों की थी फ़ौज खड़ी ॥

चलता रहूँ कर्म पथ पर, पग पीछे मेरे न हटे

सच्चाई की राह पर, लेखनी मेरी कभी न डिगे ॥

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