ऐ मेरी प्यारी पगडंडी,
मेरे बचपन की पगडंडी,
तू है मेरे जीवन की पगडंडी।
तेरी राहों में बिखरे हैं फूल,
तेरी धूलि में नन्हे पाँव के निशान।
तेरे किनारों पर हँसते हैं झुरमुट फूल,
तेरे पथ पर गूँजती है चहकती नदियाँ।
तेरी छाँव में खेला मैंने बचपन,
तेरी कुहासों में खोए सपने।
ऊबड़–खाबड़, टेढ़ी–मेढ़ी,
जैसी भी हो, तू हमेशा प्यारी लगी।
छोड़ देता हूँ पक्की सड़कें,
जो अजनबी सी, ठंडी और तन्हा।
तेरी इन पगडंडियों को पाकर,
चलना मुझे अच्छा लगता है।
पग मेरा बढ़ता जाता है,
टेढ़ी–मेढ़ी राहों पर निर्भीक।
हर मोड़ पर मिलती है सीख,
हर मोड़ पर मिलती है जीवन की राह।
तू याद दिलाती है मुझे,
मेरा प्यारा बचपन,
छोटे–छोटे खेल,
बरसों की हँसी और कहकहियाँ।
तू याद दिलाती है राम खड़ाऊँ,
तुझ पर ही तो चले थे प्रभु।
माँ सीता और लक्ष्मण संग,
वन गमन की पावन यात्रा।
प्रभु चरणों की धूलि को पाकर,
अहिल्या मुक्त हुई श्रृषि शाप से।
तेरे पथ पर चले राम,
ऐ पगडंडी पुण्यभागिनी।
तू साक्षी है ऋषि–मुनियों की,
उनकी दैनिक तपस्या की
तेरा गौरव अतीत,
तेरा स्वर्णिम इतिहास मानवता की ।
और अब, मेरी पगडंडी,
तू मेरी यादों की साथी है।
तू सिखाती है मन को निर्भीक होना,
जीवन में हर मोड़ पर उम्मीद रखना।
ऐ मेरी प्यारी पगडंडी,
मेरे बचपन की पगडंडी,
तू है मेरे जीवन की पगडंडी।