होली पर दोहे

फाल्गुन महिना आ गया, होली का हुड़दंग।

मस्ती में सब हो गये, मन मयूरी तरंग॥

पीली सरसों खिल उठी, टेसू दहके डार।

गांव गलियाँ गूंज उठी, रंगों की झंकार॥

ढोलक बोले थाप पर, मंजीरा दे ताल।

अबीर उड़त गगन चढ़े, रँग गया भू-भाल॥

छत पर थी नव संगिनी, नयन पथ रहि निहार।

कब आयेगें साजना, ले के फागुन हार ॥

होली पे आये नहीं, दिल है बहुत निराश।

पिया-मिलन की आस में, गोरी हुई उदास॥

अंतर जलता विरह से, बाहर रंग उमंग।

बिन साजन फीका लगे, सूना हर सत्संग॥

इतने में आहट हुई, डोला उसका प्राण।

द्वार खड़े हैं साजना, चहक उठे अरमान॥

रंग गाल पर लाग्यो , काँपी तन की डोर।

लाज मिली मुस्कान से, भींज गयो चितचोर॥

रंग न केवल गाल पर, भींजे अंतर-प्राण।

होली तब ही सार्थक, जब मिल जाए जान॥

उमानाथ कहि फाग यह, चाहत रहे अभंग।

मन-मयूरी नचा उठे, भींजे जीवन-अंग॥

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