आजी, हे मेरी आजी!
आपका प्यार, आपका त्याग,
हमेशा मेरे साथ है।
कर्म से डरो, भाग्य से नहीं,
आपकी याद मेरी राह बनाती है।
एक गांव में एक लड़का था,
जिसका बचपन अपनी आजी के साथ बीता।
सुबह चार बजे उठती, रात में सब सोने के बाद सोती,
घर का सारा काम स्वयं करती।
परिवार के सदस्य प्यार तो करते,
पर जिम्मेदारी का बोझ उठाना नहीं चाहते।
बड़े कार्यक्रम, शादी और अनुष्ठान,
सदा आजी को ही बुलाया जाता।
उनकी मेहनत, ईमानदारी और सच्चाई
सबको आसान काम देती थी।
बालक बड़ा हुआ, नौकरी पाई,
सोचा आजी को अपने पास लाऊँ, आराम दूँ।
पर नियति ने खेल खेला
आजी बीमार पड़ीं, जीवन कमजोर हो गया।
पुकारती रहीं अपने पोते को,
लेकिन समय पर मिल न पाया।
आजी, हे मेरी आजी!
आपका प्यार, आपका त्याग,
हमेशा मेरे साथ है।
कर्म से डरो, भाग्य से नहीं,
आपकी याद मेरी राह बनाती है।