ड्योढ़ी का बँटवारा

ले ले भाई सब कुछ तू

पर इस ड्योढ़ी का बँटवारा मत कर ।

यहीं पर मेरा बचपन बीता था

यहीं पर तेरा बचपन बीता था

ड्योढ़ी पार तू कर नहीं पाता था

खींच कर तुझको पार कराता था ।

यहीं पर अम्माँ बैठी रहती थी

यहीं पर बप्पा बैठे रहते थे,

पुरखों की यादें यहीं पर बसती हैं

उन यादों को विस्मृत मत कर ।

ईंट गारे से ही नहीं बना घर है

पुरखों की यह धरोहर है,

स्वार्थ लोभ में पड़कर तू

इस चौखट का बँटवारा मत कर ।

बचपन बहुत ही प्यारा होता है

उसकी यादें जीवित रहती हैं,

छोड़ रहा हूँ सब कुछ अपना

पर मेरे बचपन का बँटवारा मत कर ।

लौटूँगा यदि कभी यहाँ पर

बचपन इन्हीं में अपना ढूँढूँगा,

यादें सब ताज़ा होयेंगी

मधुर यादों को खंडित मत कर ।

ले ले भाई सब कुछ तू

पर इस ड्योढ़ी का बँटवारा मत कर ।

कवि

नोएडा उत्तर प्रदेश

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