खड़ा हुआ हूँ
गाँव के इक छोर पर,
देख रहा हूँ गाँव का
बदला बदला स्वरूप ।
ढूँढ रहा हूँ अपने
बचपन की पगडंडियों को
जिन पर मैं चलता था
जिन पर मेरा बचपन बीता था ।
कहाँ गयी वे पगडंडियाँ
कहाँ गया वह बरगद का वृक्ष,
जिनकी छाँव में बैठा करता था
खेला कूदा करता था ।
कहाँ गये उस पोखर के तीर पर
लगे वे पुराने दो आम के वृक्ष,
जिनके फल मैं तोड़कर लाता था
तालाब में फल गिरने नहीं देता था ।
मेरे बचपन की वे पगडंडियों
बहुत ही मुझको प्यारी थी,
टेढ़ी मेढ़ी , कच्ची, धूल भरी ही सही,
मुझे अंधेरे में भी घर तक पहुँचाती थीं ।
अब वे नहीं दिख रही
लगता हैं विकास के नाम पर
मुझसे रूठ कर बलिदान हो गई
ईंट पत्थरों के नीचे दब गईं ।
वह ऊँचा इमली का वृक्ष
जिनकी इमली तोड़ा करता था,
काट दिये गये कुछ पैसों के लिए
मानव स्वार्थ की वे बलि चढ़ गए ।
लगता है वो प्यारी पगडंडियाँ
वे मेरे बचपन के वृक्ष,
जिन्हें छोड़ कर शहर मैं आया था
मुझसे रूठ कर चले गए ।
मेरी यादों में सब सूख गये
इंतजार करते करते विलुप्त हो गये,
बचपन की उन पगडंडियों को
मेरी आँखें आज भी ढूँढ रही हैं ।
काश दिख जाती, वो प्यारी पगडंडियाँ,
मेरे दिल में जो अभी भी जीवित हैं,
मेरा बचपन लौट आता
मेरी यादें ताज़ा हो जाती ।