मैं ढलती सी शाम अंधेरों से डरती हूँ,
कभी मिले फुर्सत के पल बेटा, आ जाना मिलने को ॥
मेरा बुढ़ापा अकेलापन मुझे डराता है
मैं मरने से नहीं डरती यह तो शाश्वत सत्य है
कोई अमर पद पाकर इस दुनिया में कहां आता है
मुझे चाहिए तेरा साथ अंधकार से डरती हूँ
कभी मिले फुर्सत के पल बेटा आ जाना मिलने को ॥
नहीं गोद में मुद्दत से तू मेरे लेटा
थोड़ा समय निकाल कभी तू पास मेरे भी बैठाकर
मुझे नहीं चाहिए धन और दौलत, केवल तेरा प्यार चाहिए
मैं तुझे देखने के लिए तरसती हूँ
कभी मिले फुर्सत के पल बेटा आ जाना मिलने को ॥
कुछ तो साझा बात कभी मुझसे भी किया कर
मुँह फेर कर तू मुझसे न जाया कर
फ़ुरसत के दो पल बेटा, मेरे लिए कहीं से ले आ
तू मेरी गोद में सो जा, मैं तेरा सर सहलाती हूँ
कभी मिले फुर्सत के पल बेटा आ जाना मिलने को ॥
मैं ढलती सी शाम अंधेरों से डरती हूँ,
कभी मिले फुर्सत के पल बेटा आ जाना मिलने को ॥