मीरा के गिरधर गोपाल भजन

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा, दूजा न कोई जानूँ।

देह–भेद सब मिथ्या लागे, प्रेम बिना कुछ न मानूँ॥

मेवाड़ महल, राज वैभव,

सब तज आई मीराँ,

कुल की मर्यादा, लोक लाज,

गिरधर पर वार दी पीराँ

छाले पैरों, प्यास हिय में,

नाम रटूँ दिन-रैनूँ॥

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

वृन्दावन पहुँची, संत द्वार पर,

दर्शन की अभिलाषा,

गोस्वामी जी नियम कह बैठे,

“स्त्री से मिलना बाधा”

मीराँ हँसी, मधुर बोली,

वाणी बनी तराजूँ॥

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

“मैं तो समझूँ ब्रज में केवल,

एक पुरुष हैं गिरधर,

बाकी सब तो सखियाँ ही हैं,

प्रेम-वसन धर कर,

आज पता चला ब्रज धाम में,

और भी पुरुष जानूँ॥”

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

भोर हुई जब खुले कपाट,

अचरज आँखन छाया,

घाघरा–चोली धर ठाकुर ने,

नारी रूप दिखाया,

झुमका, बिंदी, पायल बोले,

मुरली मौन, मुस्कानूँ॥

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

ढह गया सारा ज्ञान–अहंकार,

पिघला विद्या–भंडार,

समझेभक्ति के आँगन में,

न स्त्री–पुरुष विचार,

आत्मा बोले प्रेम भाषा,

यही सच्ची पहचानूँ॥

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

नंगे पाँव दौड़े गोस्वामी,

मीरा चरण गिरे,

“मैंने देह को देखा माता,

आपने आत्मा फिरे,

मीराँ बोली“चलो प्रभु संग,

राह देखे भगवानूँ॥”

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

पीताम्बर फिर धारण किए

पर दृष्टि बदल गई,

कभी मीरा में कृष्ण दिखे,

कभी कृष्ण में मीराँ भई

भक्त–भगत में भेद न रहा,

एक ही रस पहचानूँ॥

मेरे तो गिरधर गोपाल सखा॥

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