मन में एक जिज्ञासा है, क्या भीष्म पितामह
जीवन में कभी ख़ुश रहे होंगे,, खुलकर हंसे होंगे ?
हंसे भी होगें ,, तो किसके साथ ? विदुर के साथ या चक्रधारी के साथ, ,,या जीवन पर्यन्त मूक रहे
दुर्योधन महत्वाकांक्षी था, धृतराष्ट्र पुत्र मोह में बंधे थे,
प्रिय पांडव साथ नहीं थे, मन की वेदना किससे कहते ?
विदुर जी ही सच्चे साथी थे, मन की बात उनसे करते थे,
वे भी साथ कहाँ दिए, धृतराष्ट्र से नाराज़ होकर चल दिए ।
जिसको चाहते थे, वे साथ नहीं रहते थे.
जिसको पसंद नहीं करते थे, उनकी सुनने को विवश थे,
पितृ वचन में जो बंधे हुए थे !
पिता के लिए प्रतिज्ञा की, जीवन पर्यन्त शादी न करने की,
हस्तिनापुर नृप न बनने की , निभाया उसे जीवन पर्यन्त ।
“ भीष्म प्रतिज्ञा “ ऐसे नहीं कहते, यह त्याग और बलिदान की कहानी है !
एक सशक्त, धनुर्धारी, सामर्थ्य वान, विश्व विजेता,
इच्छा मृत्यु का वरदानी, भगवान परशुराम का शिष्य,
बिंधते रहे वाण, सहते रहे, मुस्कुराते रहे,
अपनों से लड़े, अपनों के लिए मरे !
छ माह तक प्राण नहीं छोड़ा, बाणों की शैय्या पर लेटे रहे,
कौन है ऐसा पृथ्वी पर, जिसके उनकी तुलना की जाए !
बोले थे श्रीकृष्ण से, क्या पाया आपने प्रभु ?
क्या यह सब ठीक था, हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए इतना बड़ा नर संहार ?
बोले श्रीकृष्ण - मैं तो कहीं था ही नही भीष्म क्या कह रहे हो..,मैंने तो शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, मात्र एक सारथी बना पार्थ का ,तुमने ही मेरी शर्त तुड़वाई ..,
सोचो भला दूसरा कौन था, ऐसा सामर्थ्य वान ?
बोले भीष्म- अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे प्रभु !!
मिल गया मुझे महाभारत का सूत्र .
धर्मों रक्षति रक्षितः !
🙏🙏🙏