बीती घड़ियाँ

मैं सुन रहा केवल चुप होकर, तू चाहे जो कुछ कह ले

क्यों दिख नहीं रही वह चंचलता, जो थी तेरी पहले

मधुर और कष्ट पूर्ण भी है

जीवन की बीती घड़ियाँ

क्या लाभ हानि तू जोड़ रही

बैठी अब बिखरी कड़ियाँ

जो बीत गया सो बीत गया

मन में न बांध गाँठे

दग्ध हृदय की वेदना

धीरे धीरे सब सह ले ..

हाँ जिन वृक्षों को सींचा था, छाँव नहीं उनके तले

पागलपन का मोह रहा, या छल विश्वास के तले ..

देना हो जितना दे दे तू

लेने वाले का सिर न हिले

परिवर्तन है या संकीर्ण मानसिकता

या नया बना एक व्यापार अरे

भरा रह गया आँखों में जल

बुझी न वह ज्वाला जलती

जो बीत गया सो बीत गया

शलभ उड़े, उस ओर चले

मैं सुन रहा केवल चुप होकर, तू चाहे जो कुछ कह ले

क्यों दिख नहीं रही वह चंचलता, जो थी तेरी पहले

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