बेटियाँ परायी कब होती हैं?
क्या जब उनकी शादी होती है?
और वे घर की चौखट से विदा होती हैं?
नहीं
यह तो जीवन की एक नई शुरुआत है।
नई मंज़िल है नया आकाश है।
बेटियाँ परायी तब होती हैं
जब वे मायके आती हैं
और झिझक जाती हैं
कभी मुस्कुराना भी सोचकर करती हैं।
भाभी-भैया का मूड देखती हैं,
हर शब्द बोलने से पहले संभलती हैं।
किचन के सामने खड़ी होकर
टुकुर-टुकुर देखती हैं,
भीतर जाने से हिचकती हैं।
अपना पुराना बिस्तर देखती हैं
अपनी चीज़ें छूती हैं
जहाँ कभी बचपन बीता था
वही जगह आज अजनबी लगती है।
वो घर अब घर नहीं लगता। 💔
बेटियाँ परायी तब होती हैं
जब मायके में सम्मान कम होता है,
जब हर बात में यह सुनने को मिलता है
“अरे बेटी! अब तुम तो ससुराल की हो गई।”
जब माँ-बाप भी
उसी प्यारी बेटी को
“पराया धन” समझने लगते हैं।
धीरे-धीरे किनारा करने लगते हैं।
ससुराल में ताने मिलते हैं,
व्यंग्य-वाण सुनती है,
मुस्कान ओढ़ लेती है
पर भीतर से घुटती रहती है।
कभी कहना चाहती है
पर कह नहीं पाती,
क्योंकि हर ओर चुप्पी ही दीवार बन जाती है।
पर सोचो
क्या यही सच है?
क्या सच में बेटियाँ परायी होती हैं?
नहीं!
बेटियाँ कभी परायी नहीं होतीं।
वो तो हमारे ही आँगन की कली हैं,
हमारे हृदय की धड़कन हैं,
हमारे जीवन की रोशनी हैं।
उन्हें अधिकार दोसम्मान दो
स्वतंत्रता दोताकि वे सशक्त बनें
और अपना आकाश स्वयं रचें।
क्योंकि
बेटियाँ परायी नहीं
परम प्यारी होती हैं