अपना जपूँगा महामंत्र

अपना जपूँगा महामंत्र

अपना जपूँगा महामंत्र

किसकी खोजूँ मैं शरण

सबका जीवन वैचित्र्य भरा

अपना स्वार्थ साधने में

संसार है ये पड़ा ॥

अहम का बोलबाला है

दिल आज काला है

विश्वास हम किस पर करें

अपने ही छीनते निवाला है

रिश्तों में भी अब नहीं

पहले जैसी मिठास

अपना स्वार्थ साधने में ही

संसार है ये पड़ा

अपना जपूँगा महामंत्र ॥

पराये आज अपने हैं

अपने पराये लगते हैं

आमने सामने मिलते हैं

बात नही करते हैं

दिलों में अब वह प्यार नहीं

नफ़रत ही नफ़रत भरा

अपना स्वार्थ साधने में ही,

संसार है ये पड़ा

अपना जपूँगा महामंत्र ।

अपने में हैं सब सुखी

अपनों पर करते नाज है

रिश्ते सब बेमानी हुए

संबंधों पर गिरी गाज है

हर कोई अपने लिए ही

स्वार्थ की राह पर चला

अपना स्वार्थ साधने में ही

संसार है ये पड़ा

अपना जपूँगा महामंत्र ॥

चाल चलते शकुनि जैसे

हड़पते पराया धन है

हर कोई अपने लिए ही

अपनी जंग तो है लड़ा

परमार्थ है अब सपना जैसा

अपना ही जपता महामंत्र

अपना स्वार्थ साधने में ही,

संसार है ये पड़ा

अपना जपूँगा महामंत्र ॥

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