एक ही बार नहीं
कई बार देखी मैंने बाग़बान मूवी।
चलचित्र ही सही,
पर है तो यही जीवन की सच्चाई।
ऐसी मार्मिक कहानी
हृदय-स्थल को मेरे छू गई।
कहानीकार भी वही लिखता है
जो अपने आसपास देखता है।
जरा कल्पना करो
जिसका जीवनसाथी बिछड़ गया हो,
उस पर कैसी बीतती होगी?
जीना तो होगा,
पर वह बात कभी नहीं होगी।
“ऐ जी उठो! बिस्तर छोड़ो”
“चाय तैयार है, यहीं दे दूँ?”
“नहीं-नहीं, पहले जाकर फ्रेश होइए,
तब मिलेगी चाय।”
अब कौन यूँ पुकारता होगा?
सुबह की चाय से दिन की शुरुआत होती है।
प्यार से एक प्याली चाय न मिले,
तो सोचोदिल पर कैसी बीतती होगी।
शायद बिछुड़ने पर ही
उसकी कीमत समझ आती होगी।
नाश्ते में क्या लेना है,
लंच में क्या पकाना है,
डिनर में केवल हल्का खाना है
दवा ली कि नहीं
पत्नी एक डॉक्टर-सी
हर हिसाब रखती है।
कमरे में पड़े कपड़े
कभी इधर, कभी उधर।
कौन अब उन्हें समेटेगा?
पहले तो ध्यान ही नहीं देते थे।
मोबाइल पर दिन बिताते थे,
साथ बैठकर बातें नहीं करते थे।
ग़ुस्सा करते थे
जैसे मोबाइल उसकी सौतन हो।
अब कौन टोकता होगा?
बेमन से दिन कटता होगा।
ख़ुशहाल जोड़ों को देखकर
मन चुपचाप रोता होगा।
कभी किसी पार्क की बेंच पर
एकाकी बैठा,
नीरवता से बातें करता होगा।
हम अमूल्य समय यूँ ही गँवा देते हैं।
प्यार कम करते हैं, झगड़ते ज़्यादा।
यारों! जीते-जी इस ज़िन्दगी को
ख़ुशी से जी लो
बाद में तो केवल
आँसुओं का सहारा होता है।