कितना क्रूर हुआ इंसान
कितना क्रूर हुआ इंसानमार रहा अब स्वयं इंसान, प्रेम की भाषा भूल गया तूशस्त्रों में उलझा,बना शैतान॥धरती माँ कराह रही हैनदियों का आँचल सूख गया,नौनिहालों को भी न छोड़ाईश्वर का मन भी टूट गया॥लोभ, सत्ता, स्वार्थ के मारेकितने सपने तूने मारे, उठ मानव! अब भी सुधर जाईश्वर का भी है कुछ विधान॥विनाश नहीं सृजन ही … Read more