हरे कृष्ण हरे मुरारी, जय हो महिमा भारी,
भक्त पुकारे सच्चे मन से, दौड़ें श्री बिहारी॥
दुर्योधन का मन बहक उठा, बोला मुनिवर जाओ
वन में रहते पांचों पांडव, उनका आतिथ्य पाओ।
दुर्वासा संग शिष्य अनेक, पहुँचे पांडव कुटिया द्वार,
कहें “भोजन दे हे कुन्तिनंदन!”, सब पड़ गए विचार॥
अक्षय पात्र था द्रौपदी के, सूर्य देव उपहार,
दिन का समय गया था बीता, न अन्न, न व्यवहार।
सोचे पांडव क्या उपाय अब, कैसे करें सत्कार?
भूख लगी मुनिदल को भारी, संकट यह अपार॥
द्रौपदी बैठी व्यथित हृदय से, बोली कर करुन पुकार,
“हे कृष्ण! आज सहाय करो, रख लो मेरी लाज अपार।
क्रोधित दुर्वासा कुटिया आये, श्राप न दे दें ये भारी,
प्रभु दिखाओ अब कोई राह, रक्षा करो हे कृष्ण मुरारी॥”
“जब जब दुख की घड़ी पड़ी है, तुम ही बने सहारा,
आज विकट समस्या आयी, हर लो यह अंधियारा।
आओ कान्हा! हे सखा मेरे, सखी की लाज तुम्हारी,”
सच्ची पुकार सुनि हरि पहुँचे,त्वरित द्रौपदी के द्वारी॥
मुस्काते बोले “दिखा सखी, क्या है तेरे पात्र में,”
द्रौपदी लाई पात्र झटपट, श्रद्धा भरे उस मात में।
दृष्टि पड़ी जब साग शेष पर, हरि बोले मुस्काई,
एक निवाला मुख में धरते, त्रैलोक्य तृप्ताई॥
मुनि शिष्य सब तृप्त हुए, क्या अद्भुत व्यवहार,
सोचें “अब कैसे जाएँ वापस, यह कैसा उपहार?”
भागे मुनिजन चुपके-चुप, बोले सब संसारी
क्षमा करो हे प्रभु ! भूल हो गयी मुझसे आज भारी ।
कृष्ण कहे “सखी सुन ले तू, भक्ति में ही शक्ति,
भक्त पुकारे सच्चे मन से, मैं देता हूँ भक्ति।
जो भी हरि को स्नेह करे, मन निर्मल, निष्कपट पावन,
उसका संकट हर लेता हूँ, बनकर प्रेमी सावन॥”
आज भी कथा कहे संसार “भक्ति करे जो नर नारी,
द्रौपदी जैसी आस्था हो, तो हरि करें देर न भारी।”
अक्षय पात्र न केवल पात्र, हरि-विश्वास प्रतीक,
जिसने पाया प्रेम हरि का, वही हुआ निर्भीक॥
हरे कृष्ण हरे मुरारी, जय हो महिमा भारी,
भक्त पुकारे सच्चे मन से, दौड़ें श्री बिहारी॥
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