आधुनिक ज्ञानी हास्य

व्हाट्सएप पढ़कर ज्ञानी बने,

गूगल से ही ग्रंथ रचे,

ना वेद पढ़े, ना शास्त्र पढ़े

हर विषय पर भाषण ठचे।

अधूरी बातों का शोर मचाया,

सत्य को अफ़वाह में मिलाया,

शीर्षक देखा, अर्थ न जाना,

फिर भी खुद को ज्ञानी कहलाया ।

जो समझाए, उसे मूर्ख ठहराएँ,

खुद की भूल कभी न मानें,

प्रश्न उठे तो क्रोध दिखाएँ,

तर्क नहीं, बस शब्द चलाएँ।

दाढ़ी, कुर्ता, मुख पर तेज़,

भीतर खाली, बाहर से सेज,

ज्ञान नहीं, प्रदर्शन भारी,

तालियों की भूख है सारी।

कहते हैंहम सब जानते हैं,

पर सीखने से कतराते हैं,

श्रवण छोड़, भाषण पकड़ा,

बातों में जनता को जकड़ा ।

धर्म, नीति, समाज, विज्ञान,

सब पर है इनका ही ज्ञान,

पढ़ना-समझना समय कहाँ,

फॉरवर्ड ही बन गया प्रमाण।

ज्ञान का ऐसा फैशन छाया,

पैसा फूँका, डेटा पाया,

सोच उधार, विचार किराए,

अपना विवेक कहीं खो आया।

सच्चा ज्ञानी चुप रहता है,

कम बोले, अधिक सहता है,

जो जानता है, वह झुकता है,

शोर वही जो खाली रहता है।

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