सम्मान की होड़ हास्य

कभी सम्मान तप से मिलता था,

साधना, त्याग और श्रम से।

आज सम्मान की बोली लगती है,

पोस्टर, पैसे और छल से।

जहाँ शब्द कम, बैनर भारी,

जहाँ विचार नहीं, सिफ़ारिश प्यारी।

जिसने छपवा ली मोटी पुस्तक,

चाहे भीतर हो रिक्तता सारी।

मंच सजा है फूलों से,

माइक गूँजता लच्छेदार भाषणों से।

सम्मान सूची लंबी इतनी,

बैठे इंतज़ार करते घंटों से।

कवि बैठा है अंतिम पंक्ति में,

जिसने रातों को शब्द गढ़े।

आगे बैठे हैं वो सज्जन,

जिन्होंने संस्थापक के कसीदे पढ़े।

तालियाँ भी अब तयशुदा हैं,

कब बजनी, कब रुक जानी हैं।

अपना चहेता यदि पढ़ रहा,

तालियाँ गड़गड़ाती हैं।

सम्मान समारोह में भाव नहीं,

बस फोटो खिंचवानी आती है।

कोई पूछे या न पूछे,

माननीय के साथ पिक भाती है।

जिसे पढ़ा नहीं किसी ने,

वो भी “महान” कहलाया।

जिसे समझा नहीं किसी ने,

उसने भी मंच सजाया।

सम्मान अब साध्य नहीं रहा,

सम्मान साधन बन बैठा।

काम पाने की सीढ़ी बनकर,

ईमानदारी को कुचल बैठा।

पहले काम बोलता था,

अब काम से पहले शोर।

मूल्य खड़े हैं कटघरे में,

और तमगे मचा रहे होड़।

कोई स्वयं को सम्मान दे,

कोई खुद ही अध्यक्ष बने।

अपने ही हाथों माला डाल,

अपने ही गुणों के क़िस्से तने।

साहित्य चुपचाप देख रहा,

अपनी लाज बचाए बैठा।

कविता रोए कोने में,

व्यंग्य मुस्कुरा कर सब सह बैठा।

पर याद रहे ऐ मंच सजाने वालों,

सम्मान टिकता दिखावे से नहीं।

जो समय की कसौटी पर खरा न उतरे,

वो नाम इतिहास में नहीं।

जिस दिन श्रम को मान मिलेगा,

उस दिन तमगा मौन रहेगा।

जिस दिन कृति खुद बोलेगी,

सम्मान स्वयं चलकर आएगा।

तब न होगी होड़, न शोर,

न माला की राजनीति।

सम्मान होगा साधना का फल,

और साहित्य की सच्ची नीति।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.