राम वाल्मीकि संवाद

बोले राम- हे श्रृषिवर ! सुरम्य स्थल कोई बताओ

कहाँ पर ठाँव बनाऊँ मैं

कण कण में निवास आपका,सर्वत्र आपको पाऊँ मैं

बोले वाल्मीकि - हे प्रभु ! कहाँ पर ठाँव दिखाऊँ मैं

भला कौन सा है ऐसा स्थल,,,जहां आप नहीं रहते हैं

आप तो त्रिकालदर्शी हैं, करतल पर जग को रखते हैं

आप साक्षात जगदीश्वर हैं, माँ जानकी आदि शक्ति

शेषावतार हैं श्री लक्ष्मण,,, ब्रह्मांड को धारण करते हैं

जिसको जनाते हैं प्रभु आप, वही जानता है आपको

जो जान आपको लेता है, समर्पित हो जाता आपको

चिदानंद मय देह आपकी,, नर रूप में लीला कर रहे

यह रहस्य विरले ही जानते,, जो जानता है आपको

कौन सी बताऊँ मैं ठाँव,, कौन सा स्थल दिखाऊँ मैं

कहाँ नही विद्यमान आप,,जीव जीव में दर्शन पाऊँ मैं

बसो आप उनके हृदय में, जो आपको पूर्ण समर्पित हैं

जिनके श्रवण समुद्र जैसे, नहीं अघाते सुन रामकथा

काम, क्रोध, अभिमान नहीं, राग द्वेष और लोभ नहीं

एक झलक आपकी पाने को, चातक जैसे तकते हैं

सबके प्रिय सबके हितकारी, बड़ों का करते सम्मान

सुख- दुख,निंदा, लाभ हानि, समभाव मान अपमान

स्वर्ग नर्क मोक्ष की न चिंता,आश्रय केवल है आपका

आप ही माता-पिता दोनो,आप ही हैं प्रभु गुरू समान

मानव रूप में पूंछ रहे प्रभु , एक सुन्दर ठाँव जताता हूँ

कुछ काल निवास करे चित्रकूट, मन्दाकिनी के तट पर

राम घाट स्थल कहलायेगा, स्नान करे वो तर जायेगा

पावन करे इस धरती को, अत्रि श्रृषादि यहाँ बसते है ..

कण कण में निवास आपका, सर्वत्र आपको पाऊँ मैं

हे प्रभु ! आप ही बताओ,,,,कौन सी ठाँव दिखाऊँ मैं ॥

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