प्रेम नापने की वस्तु नहीं, होता इक सुखद अहसास हैं
न तौलें इसे कभी तराज़ू में, प्रेम तो चाहता विश्वास है ।
मीठी बोली किसे न भाती, आत्मीयता का बोध कराती
स्नेह व्यवहार सदा एक जैसा हो, प्रेम होता निःस्वार्थ है ।
प्रेम बिना यह जग है सूना, प्रेम तो जगत का आधार है
प्रेम समाया जीव जीव में , कण कण में प्रेम व्याप्त है ।
प्रेम के बस में नारायण हैं, धरती पर अवतरित होते है
करते नर लीला साकार रूप में, प्रेम के प्रभु अवतार हैं ।
प्रेम कृष्ण से मीरा ने कीना, कृष्ण मय मीराबाई हो गयी
नहीं रही सुध बुध तन की, मन्दिर मन्दिर कर रही रास है ।