प्रेम गीत

प्रेम नापने की वस्तु नहीं, होता इक सुखद अहसास हैं

न तौलें इसे कभी तराज़ू में, प्रेम तो चाहता विश्वास है ।

मीठी बोली किसे न भाती, आत्मीयता का बोध कराती

स्नेह व्यवहार सदा एक जैसा हो, प्रेम होता निःस्वार्थ है ।

प्रेम बिना यह जग है सूना, प्रेम तो जगत का आधार है

प्रेम समाया जीव जीव में , कण कण में प्रेम व्याप्त है ।

प्रेम के बस में नारायण हैं, धरती पर अवतरित होते है

करते नर लीला साकार रूप में, प्रेम के प्रभु अवतार हैं ।

प्रेम कृष्ण से मीरा ने कीना, कृष्ण मय मीराबाई हो गयी

नहीं रही सुध बुध तन की, मन्दिर मन्दिर कर रही रास है ।

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