मौन से आया मौन मैं जाऊँ गीत

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन

बीच की इन साँसों में, गूँजे जीवन-गौन,

क्षण भर की ये यात्रा बस, पल भर का ये गांव

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन ॥

खुशियों के दो फूल मिले, दुख के काँटे हजार

फिर भी मन ने थाम लिया, हर पल प्रेम-उधार,

मिलना बिछड़ना धर्म रहा, खेल यही अनजाना

कौन समझे उस राही को, जो खुद को पहचाना

मंज़िल अपनी राह खुद, कर्मों ने ही जोड़ी,

धूप मिली तो छाँव मिली, बस इतनी ही झोली

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन ॥

नाम न होगा याद यहाँ, रूप न ठहरेगा

तन का मेला टूट पड़े, सब कुछ बिखरेगा,

पर जो कर्मों की अनुभूति, मन में दीप जलाए

सुगंध वही संसार में, आगे तक रह जाए,

संग न कोई धन-दौलत, संग न कोई शोर

कर्म-सुगंधि ही जगत में, रहती है सिरमौर

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन ॥

जीवन जैसे एक नदी, बहना ही पड़ता है

सुख हो या हो दुःख भरा, रहना ही पड़ता है

राहें चाहे कठिन घनी, विश्वास नहीं टूटे

मौन में भी सुर बनकर, भीतर राग फूटे ,

कर्म बजाए बाँसुरी, धुन मन को लोरी दे

सांसों का ये ताना-बाना, सत्य की डोरी दे

आया था मैं मौन ही, जाऊँगा भी मौन ॥

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