मन और मौन

कैसे स्वयं को खुश रखूँ

न चाहते हुए भी मन कभी-कभी विचलित हो जाता है।

कोई न कोई बात, कोई नज़र, कोई घटना

मन की शांति को हिला देती है।

सूर्य निकलता है, किरणें फैलती हैं,

मुस्कुराती हुई कहती हैं

“मेरी ओर झाँको, मन का ताजा करो,

दिन की शुरुआत ख़ुशियों से करो।”

पर कभी-कभी नक्षत्र विपरीत होते हैं,

राहु-केतु समय के क्षण छीनने को तत्पर।

तब लगता है

कुछ भी अपने हाथ में नहीं,

सब ऊपरवाले की मर्ज़ी पर है।

कैसे खुश रहूँ?

कहते हैं अकेलापन बुरा है,

जीवन में निराशा लाता है।

पर बड़ा परिवार होने के बावजूद

जब सुख-शांति न रहे,

तो अकेलापन ही बुरा क्यों?

यदि वही अकेलापन

शांति के पथ पर चल पड़े,

तो वह एकांतवास बन सकता है

जहाँ आत्मा अपने ही स्वर में बोलती है।

कभी-कभी मन करता है

छोड़ दूँ इस दुनिया का जंजाल,

जहाँ न सुख है, न शांति,

और निकल पड़ूँ अकेला

घने जंगलों की ओर,

जहाँ कोई न हो

मुझे परेशान करने वाला।

मन उदास है,

कुछ कह भी नहीं सकता,

क्योंकि जो कहूँगा

वह किसी को रुला भी सकता है।

तब बस मन यही कहता है

“खुद ही मुँह छिपाकर रो लूँ,

शायद कुछ मन हल्का हो जाए”

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