अंकल कहो आंटी नही

समाज में चलन बड़ा रोचक,

महिलाएँ कहें “आंटी नहीं, दीदी कहो सच!”

साठ हों या अस्सी, उम्र का पैमाना,

‘आंटी’ शब्द सुनते ही बदल जाता निशाना।

किट्टी पार्टी में हँसी का दौर,

किसी ने कहा “आंटी जी, ज़रा इधर आएँ!”

वरिष्ठ महिला फट पड़ी

“क्या तुम मेरी बेटी हो जो आंटी कह रही?”

सभी सकपका गए, बोले

“अरे नहीं, बहनजी!”

तब से ग्रुप में ‘आंटी’ शब्द से दूरी बनी।

पुरुषों की बात करें थोड़ी,

“अंकल” कहा जाए तो मन खुश हो जाई।

“श्रीमान” या “मिस्टर” में अपनापन कहाँ,

‘अंकल’ शब्द में अपनापन की छाई।

एक बार गाड़ी से हुई टक्कर,

युवक तमतमाया, निकला गुस्से में।

मैं मुस्कराया “बेटा, गलती मेरी ही है,

उम्र क्या, बच्चों से सीख ली है।”

शब्द ‘बेटा’ सुनते ही ग़ुस्सा उड़ गया,

बोला “कोई बात नहीं, अंकल जी, ध्यान रखूंगा।”

सोचता रहा मैं

“शब्द कभी ढाल बन जाता है,

सतर्कता और अपनापन में राह दिखाता है।”

पर एक बात स्पष्ट है,

मुझे ‘अंकल’ कहना बिल्कुल ठीक है।

पर मेरी श्रीमती को ‘आंटी’ कहना नहीं,

उनकी हँसी में छुपा है गुस्सा और जीवन की जीत।

“आंटी सुनते ही लगता है उम्र पूछ ली गई,

दीदी कहो, बेटा दीदी कहो!”


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