कल करे सो आज कर

साष्टांग नमन श्रेष्ठ चरणों में,

जिनसे उजियारा जग में छाया,

आज फिर सूरज मुस्काया है,

ईश्वर ने नया जीवन दिलाया।

भाग रहा है समय निरंतर,

पल–पल फिसलता हाथों से,

चौबीस घंटे सबको मिले हैं,

फिर भी कुछ खाली रह जाते हैं।

कल का सूरज दिखे न दिखे,

इसका कोई भरोसा नहीं,

अगले क्षण की साँस भी हमको,

मालूम नहीं यह होगी कि नहीं।

कबीर कहें सुन लो रे मन,

वाणी साँच सिखाए अब

“काल करे सो आज ही कर,

आज करे सो कर ले अब।”

पल भर में ही प्रलय उतर आए,

फिर किससे माँगेगा काल,

जो टाल गया शुभ कर्मों को,

हाथ रहेगा केवल मलाल।

रावण बोला अंतिम बेला,

ज्ञान भरा पर देर बहुत थी,

शुभ को टालता रहा जीवन भर,

अशुभ में मेरी जल्दी बहुत थी।

स्वर्ग की सीढ़ी बना सकता था,

सागर को मीठा कर सकता था,

सोने में भी सुगंध भरकर,

जग को मैं कुछ दे सकता था।

पर “कल–कल” करते करते मुझको,

काल ने आकर घेर लिया,

जो करना था शुभ और पावन,

वह सपनों में ही रह गया।

तब बोला वह ज्ञान-वाक्य

“शुभस्य शीघ्रम्”सुन लो आज,

शुभ को देर न लगने देना,

अशुभ को रखना सदा परे आज।

सीता-हरण था कर्म अधर्म,

उसे टालना था हर हाल,

शुभ को टालता रहा मैं मूढ़,

इसी से टूटा मेरा भाल।

अब भी समय है, जागो प्राणी,

आज ही आज को जी लो तुम,

जो शुभ सामने खड़ा हो जीवन में,

उसे अभी स्वीकारो तुम।

सूरज आज जो दिखा हमें,

वह उपहार है ईश्वर का,

हर पल को दीप बना लो मन में,

यही सार है इस जीवन का।

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