झूठ का जीवन रास न आये मन

रे मन झूठ का जीवन रास न आए

साँसों की ये माला टूटत जाए।

मन व्याकुल है, भीतर जंग लगे

काहे को माटी में मोल रचे,

कपड़ा–रोटी–छप्पर का

पल भर का यह साज सजे,

शानो शौकत मिथ्या ये शान

कल तक अपना, आज पराय

जिन पर गुमान किया था तूने

सब यम के द्वार बिखर जाए॥

जीवन भर जो जोड़–घटाया

वैद्य की चौखट छोड़ गया,

थैली खाली, देह बीमार,

संचय सब धूल उड़ गया,

कौन सा खज़ाना साथ लाया था,

किसकी गठरी संग ले जाए।

नंगे आए, नंगे जाएँ,

बीच का भरम मिटाए॥

जन्म–मरण की गाड़ी चलती,

अनहद से अनहद जाए।

कितनी योनियाँ बदल–बदलकर,

जीव यही खेल रचाए॥

पेट की आग, धन की चाह,

इसी में पाप उपजाए।

कौन अमर हो सुख भोगा है,

काल किसे न आ दबाए॥

याद कर ले कोरोना काल कठिन,

जब साँसें हुई उधार।

अपने छूटे, कंधे छूटे,

कोई न नैया लगाई पार॥

जब–जब खुद को ईश्वर माने,

धरती सबक सिखाए।

काग़ज़-पढ़ी विद्या से आगे,

सत्य कहाँ समझ में आए॥

पंचतत्व का पिंड बना यह,

पंचतत्व में जाए।

शून्य ही सांचा, शून्य ही साथी,

बाक़ी सब भरम कहाए॥

साहिब बस तू नाम कमाया,

नाम बिना सब सूना।

उमानाथ कहे सुनो भाई,

साँचा यही पुराना॥

रे मन झूठ का जीवन रास न आए,

साँसों की ये माला टूटत जाए।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.