जीवन की सच्चाई

एक ही बार नही

मैंने कइयों बार देखी बागवां मूवी..

हृदय स्थल को मेरे छू गयी

वह तो एक मूवी थी

पर है यही जीवन की सच्चाई

मूवी भी तो समाज का प्रतिबिंब होती है ।

सोच रहा हूँ ऐसी परिस्थिति

कभी न कभी तो जीवन में आती ही है

कोई साथ साथ तो जाता नही

कैसा महसूस होता होगा ??

सुबह सुबह कौन चाय पूछता होगा

कौन साथ बैठकर चाय पीता होगा ?

सुबह की चाय अगर मिस हो जाती है

लगता है दिन की शुरुआत अच्छी नहीं हुई

कहने को चाय है पर दिन की शुरुआत

यहीं से हेती

पर आत्हीं

यह तो प्यार का रूप होता है

जो कदाचित बिछुड़ने पर ही महसूस होता है ..

नाश्ते में क्या लेना है

लंच में क्या पकाना है

डिनर में भारी नहीं खाना है

एक डाक्टर की तरह

पत्नी सब हिसाब रखती है

ऊटपटाँग खाने पर

दो चार बातें सुना देती है

बिस्तर अस्त व्यस्त पड़े रहते हैं

कपड़े इधर उधर टंगे रहते हैं

कौन उन्हें दुरुस्त करता होगा

पत्नी के रहते तो पति इसे

कभी अपना काम समझता ही नही

न रहने पर भला आखिर

कैसे यह सब करता होगा .

देर रात तक जागता होगा

देर सुबह तक सोता होगा

टोंकने वाला तो है नही

अपनी मनमानी करता होगा

घर से बाहर टहलने जाता होगा

बेमन से कहीं पार्क के कोने में

ख़ाली पड़ी बेंच पर बैठा समय काटता होगा

घंटो बैठकर पूजा करता होगा

भगवान से यही माँगता होगा

हे प्रभु ! ऐसा दिन किसी के साथ न आये

अकेलापन बहुत भारी होता है

जीवन दुष्कर हो जाता है

पत्नी को पति का मोबाइल सौतन जैसे लगती है

अब तो वही सौतन काटने दौड़ती होगी

नाज नख़रे और तुनुक मिज़ाजी

जो कभी झगड़े का कारण बनती थी

सब याद आती होगी

सच्चाई तो यह है कि

हम अमूल्य समय व्यर्थ ही गँवा देते हैं

यारों!! जीते जी ज़िन्दगी ख़ुशी से जी लें

बाद में तो केवल रोना होता है

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