अजीब हालात जमाने की लोग दिल से खेल जाते हैं
तबाह करके ज़िन्दगी मासूमों की शर्म नहीं खाते हैं ।
खेल यह चौसड से कम नहीं फेंकते पाँसे शकुनि जैसे
फँसा लेते चंगुल में जीवन भर के लिये घाव दे जाते हैं ।
दक्ष हैं ये अपनी चालों में बहुत शातिर दिमाग़ रखते हैं
बुनते जाल मकड़ियों जैसे मकड़जाल में फँसा लेते हैं ।
चेहरे पर दिखाते है भोला पन हृदय में छिपाये है ख़ंजर
बदलते हैं केंचुली अपनी गिरगिट से भी बदतर होते हैं ।
ये कलियुगी दुशासन हैं हर इक मोड़ पर खड़े मिलते हैं
दुष्कर्म करें मिलकर राक्षसों जैसे मौक़े से भाग लेते हैं ।
समर्थन में इनके वकीलों का ताँता लग जाता है लंबा
झूंठी जिरह वे करके अपराधी को निर्दोष छुड़ा लेते है ।
माननीय मूक बैठे “सत्यमेव जयते”का नारा लिखते हैं
आँखों पर बंधी है पट्टी खोलकर जब चाहे देख लेते हैं ।
अबला की लाज की क़ीमत लगती है आज नोटों से
हे कृष्ण ! तुम ही आओ अब दंड पात्र सभी दिखते हैं ।