आज के दुशासन

अजीब हालात जमाने की लोग दिल से खेल जाते हैं

तबाह करके ज़िन्दगी मासूमों की शर्म नहीं खाते हैं ।

खेल यह चौसड से कम नहीं फेंकते पाँसे शकुनि जैसे

फँसा लेते चंगुल में जीवन भर के लिये घाव दे जाते हैं ।

दक्ष हैं ये अपनी चालों में बहुत शातिर दिमाग़ रखते हैं

बुनते जाल मकड़ियों जैसे मकड़जाल में फँसा लेते हैं ।

चेहरे पर दिखाते है भोला पन हृदय में छिपाये है ख़ंजर

बदलते हैं केंचुली अपनी गिरगिट से भी बदतर होते हैं ।

ये कलियुगी दुशासन हैं हर इक मोड़ पर खड़े मिलते हैं

दुष्कर्म करें मिलकर राक्षसों जैसे मौक़े से भाग लेते हैं ।

समर्थन में इनके वकीलों का ताँता लग जाता है लंबा

झूंठी जिरह वे करके अपराधी को निर्दोष छुड़ा लेते है ।

माननीय मूक बैठे “सत्यमेव जयते”का नारा लिखते हैं

आँखों पर बंधी है पट्टी खोलकर जब चाहे देख लेते हैं ।

अबला की लाज की क़ीमत लगती है आज नोटों से

हे कृष्ण ! तुम ही आओ अब दंड पात्र सभी दिखते हैं ।

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