सूखी डाली का हरियाली से संवाद

एक डाल पड़ी थी, सूखी सी,

बोली हरियाली से

“बहना! मुझे अपने पास बैठने देना,

मेरा तिरस्कार मत करना।”

“तुम जैसी थी मैं हरी भरी,

खूब प्रफुल्लित रहती थी।

तूफान का एक झोंका आया,

मुझे तोड़ कर चला गया।”

“लोग तुझे ताकते रहते हैं,

मेरी तरफ मुँह नहीं फेरते हैं।

तू तो हो मेरी प्यारी बहना,

मुझसे तुम अलग मत होना।”

बोली हरियाली “सुनो प्रिय बहन,

तुम पहले जैसी अब नहीं रही।

तेरी काया अब नहीं सुन्दर है,

दुनिया सुंदर काया की क़ायल है।”

“कैसे रखूँ तुझे अपने पास?

कुछ दिनों में सड़-गल जायेगी।

इससे भला तू अग्नि से कर ले दोस्ती,

अग्नि की ताप में तू जल जा।”

“सर्दी का यह मौसम है,

लोग अलाव खूब जलाते हैं।

तू उसी अलाव में जाकर जल जा,

अपना जीवन सार्थक कर जा।”

“आग में तप कर ही तो,

सोना खूब चमकता है।

नहीं चाहती यदि सड़ना-गलना,

ताप रूप में परिवर्तित हो जा।”

“ताप की गर्मी तेरी पाकर,

लोग तुझे खुशी-खुशी अपनायेंगे।

ताप रूप में उनके भीतर,

जा तू प्रविष्टि कर जा।”

“सबका जीवन ऐसा ही होता है,

इक दिन जलना होता है।

जीवन का होता यह क्रम है

जन्मना, मरना, जन्मना होता है।”

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