समय और मैं वैराग्य भाव

समय तो चलता अपने पथ पर,

मैं भी चलताधीरे, चुपचाप,

न उसे थाम सकूँ, न रोक सकूँ,

बस साक्षी बन कर करूँ प्रताप।

तन शिथिल है, साँसें सीमित,

मन अब भी भटके संसार,

पर भीतर कोई स्वर कहता

“छोड़ मोह, ये जग व्यवहार।”

जो आया था, वह चला गया,

जो मिला था, वह भी क्षणिक,

राह में छूटे अपने–पराये,

सब थे केवल जीवन-चित्रिक।

न दौड़ अब है, न हड़बड़ी है,

न जीत का कोई अभिमान,

जो मिला, उसे स्वीकार किया,

जो छूटा, उसका भी सम्मान।

धूप–छाँव दोनों को देखा,

सुख–दुख दोनों समान लगे,

जिस दिन मन तटस्थ हो गया

बंधन अपने आप ढीले पड़े।

समय न मेरा, मैं न समय का,

दोनों अपनी-अपनी चाल,

जीवन अब केवल साधना है,

श्वास–श्वास में मौन रसाल।

अंत न भय है, न आकांक्षा,

न कुछ पाने, न कुछ खोने का शोर,

वैराग्य नहीं पलायन है,

यह तो बोध हैमैं कौन हूँ, और।

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