प्रकृति

चलते चलते थक जाता हूँ फिर भी चलता रहता हूँ

इच्छा तृप्त नहीं होती प्रकृति में विचरण करता हूँ ।

पत्तों पत्तों में पाता हूँ अद्भुत रचना सृष्टिकर्ता की

जीवों जीवों में पाता हूँ अद्भुत रचना सृष्टिकर्ता की

कण कण में अनुभूति होती उस परम ईश्वरीय सत्ता की

ईश्वर की इस अनुपम सृष्टि को मैं प्रणाम करता हूँ ।

अनगिनत जीव पशु पक्षी हैं सबके रंग निराले हैं

गतिविधियों को देखता रहता उनके जीने के ढंग निराले हैं

कोई जलचर है, कोई थलचर, कोई तो गगन गामी हैं

अपने अपने में सब अद्भुत हैं सृष्टि कर्ता के ढंग निराले हैं ।

प्रकृति के सानिध्य में ही परम सुख शांति मैं पाता हूँ

इच्छा तृप्त नहीं होती प्रकृति में विचरण करता हूँ ।

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