फँसे सांसत में मेरे प्राण हास्य

फँसे साँसत में मेरे प्राण

चलाती वो तो नैना वाण,

कहता फिर भी मेरी जान

तुम बिन कैसे जिये ।

यही तो है असली पति की पहचान

मन में इसे सब लो ठान,

पीछे पीछे पति घूमता

हर घुड़की वह सहता रहता

मौन धारण कर सुनता रहता,

झाड़ू पोंछा घर का करता

किचन का पूरा कार्यभार सँभालता

ऊपर से वह बेलन की धमकी खाता

बच्चों की वह कपड़ा कंघी करता

स्कूल समय से उसे पहुँचाता

फ़्री का नौकर है वह घर का

एक दिन की न छुट्टी पाता

चैन की ज़िंदगी न जी पाता ।

कवियों के लिये तो है खास मुसीबत

मन कभी जब न स्थिर होता

कैसे सुन्दर सृजन कर पाता

उफ़ बेचारा वह कभी न करता

फिर भी पत्नी की तारीफ़ की जमकर पुल बांधता

हृदय से वह गर्वित होता ।

धन्य है ऐसे जिगर का पति महान

ऐसे पतियों का होये कल्याण ।

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