मुझे तेरे कर कमलों की चाह

हे प्रभु ! मुझे तेरे कर कमलों की चाह

जिन कर कमलों से शिव धनु तोड़ा

दूर किया संदेह जनक का

जिन कर कमलों से गुह निषाद को भेंटा

मुझे उन्हीं कर कमलों की चाह ।

जिन कर कमलों से जटायु को लीन्हा

पितृ समान पिण्ड दान दिया

जिन कर कमलों से भरत को अंक लगाया

मुझे उन्हीं कर कमलों की चाह ।

जिन कर कमलों से बालि को मारा

सुग्रीव को अभय दान दिया

जिन कर कमलों से विभीषण को उठाया

मुझे उन्हीं कर कमलों की चाह ।

जिन कर कमलों से राक्षसों को मारा

देवताओं को अभयदान दिया

जिन कर कमलों से धनुचाप चढ़ाया

मुझे उन्हीं कर कमलों की चाह ।

जिन कर कमलों की शीतल छाया में

भक्त गण शरणागति पाते हैं

जिन कर कमलों से छूते ही तरते पापी

मुझे उन्हीं कर कमलों की चाह ।

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