मैं अवगुण की खानी भजन

प्रभु ! क्यों लगाऊँ दोष तुम्हें, मैं ही अवगुण की खानी..

प्रभु क्यों लगाऊँ दोष तुम्हें, मैं ही हूँ अवगुण की ख़ानी

सार नही जब बाँस के भीतर, बेचारा चंदन सुगंध कैसे भरे ।

करील लगाये दोष बसंत को, हरा भरा मुझे नहीं करता है

हत भाग्य असल है वह करील,बिन पत्ते हरा भरा कैसे करे ।

ईश्वर ने दी है बुद्धि हमको, ज्ञान का भीतर प्रकाश दिया

दोष हमारा अपराध हमारा, मानव तन पाकर कुछ न करे ।

प्रभु ! मैं क्यों लगाऊँ दोष तुम्हें, मैं ही अवगुण की खानी..

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