माँ सरस्वती

हे हंस वाहिनी ! ज्ञान दायनी ! तू तो जगत की माता माँ

तेरा दर्शन मिल जाये माँ, जीवन मेरा धन्य हो जाये माँ ।

तू कालिदास की है आराध्या

कुंठित बुद्धि को तीक्ष्ण करे,

जिव्हा पर सदा बसती है माँ

मूक को वाणी दे जाती माँ ।

हृदय के भावों की अभिव्यक्ति

मेरे स्वप्नों में तू आती है माँ,

मीठी यादें सब ताज़ा कराती

मन प्रफुल्लित कर जाती माँ

तेरे मन मन्दिर में आते ही

छठी इन्द्रिय द्वार खुलते हैं मां,

मन कल्पनाओं में उड़ने लगता

नव विचार सृजन करती माँ ।

ब्रह्म मुहूर्त में ही तू आती है

धौले से थपकी देकर जगाती माँ,

वीणा की मीठी झंकार सुनाती

मन के तारों को झंकृत करती माँ ।

इन्द्रियों के झरोखों में बसती है

अन्तर्मन के भावों को दर्शाती माँ,

सुन्दर शब्दों की माला पिरोती

लेखनी स्वतः मेरी चल जाती माँ ।

कोरे काग़ज़ में तू प्रकट हो जाती

सुन्दर रचना का रूप दे जाती माँ,

उमानाथ कितना भी गुणगान करे

प्यासा मन तृप्त नहीं होता है माँ ।

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